Saturday, 19 December 2015

माँ

जब आंख खुली तो माँ की
गोदी का एक सहारा था,
उसका नन्‍हा सा आंचल मुझको
भूमण्‍डल से प्‍यारा था ।

उसके चेहरे की झलक देख
चेहरा फूलों सा खिलता था,
हाथों से बालों को नोंचा
पैरों से खूब प्रहार किया,
फिर भी उस माँ ने पुचकारा
हमको जी भर के प्‍यार किया। 

मैं उसका राजा बेटा था
वो आंख का तारा कहती थी,
उंगली को पकड. चलाया था
पढने विद्यालय भेजा था। 
मेरी नादानी को भी निज
अन्‍तर में सदा सहेजा था । 
 
मेरे सारे प्रश्‍नों का वो
फौरन जवाब बन जाती थी, 
मेरी राहों के कांटे चुन
वो खुद गुलाब बन जाती थी। 

मैं बडा हुआ तो कॉलेज से
इक रोग, प्‍यार का ले आया, 
जिस दिल में माँ की मूरत थी
वो एक रामकली को दे आया। 

शादी की, पति से बाप बना
अपने रिश्‍तों में झूल गया, 
अब करवाचौथ मनाता हूं
माँ की ममता को भूल गया। 
 
हम भूल गये उसकी ममता
जो, मेरे जीवन की थाती थी,
हम भूल गये अपना जीवन
वो अमृत वाली माती थी। 

हम भूल गये वो खुद भूखी
रह करके हमें खिलाती थी,
हमको सूखा बिस्‍तर देकर
खुद गीले में सो जाती थी। 

हम भूल गये उसने ही
होठों को भाषा सिखलायी थी,
मेरी नीदों के लिए रात भर
उसने लोरी गायी थी। 

हम भूल गये हर गलती पर
उसने डांटा समझाया था,
बच जाउं बुरी नजर से
काला टीका सदा लगाया था। 

हम बडे हुए तो ममता वाले
सारे बन्‍धन तोड. आए,
बंगलों में कुत्‍ते पाल लिए
माँ को वृद्धाश्रम छोड आए। 

उसके सपनों का महल गिरा कर
कंकर-कंकर बीन लिए,
खुदग़र्जी में उसके सुहाग के
आभूषण तक छीन लिए। 

हम माँ को घर के बंटवारे की
अभिलाषा तक ले आए,
उसको पावन मंदिर से
गाली की भाषा तक ले आए। 

माँ की ममता को देख मौत भी
आगे से हट जाती है,
गर माँ अपमानित होती
धरती की छाती फट जाती है। 

घर को पूरा जीवन देकर
बेचारी माँ क्‍या पाती है,
रूखा सूखा खा लेती है
पानी पीकर सो जाती है। 

जो माँ जैसी देवी घर के
मंदिर में नहीं रख सकते हैं,
वो लाखों पुण्‍य भले कर लें
इंसान नहीं बन सकते हैं। 

माँ जिसको भी जल दे दे
वो पौधा संदल बन जाता है,
माँ के चरणों को छूकर पानी
गंगाजल बन जाता है। 

माँ के आंचल ने युगों-युगों से
भगवानों को पाला है,
माँ के चरणों में जन्‍नत है
गिरिजाघर और शिवाला है। 

हिमगिरि जैसी उंचाई है
सागर जैसी गहराई है,
दुनियां में जितनी खुशबू है
माँ के आंचल से आई है। 

माँ कबिरा की साखी जैसी
माँ तुलसी की चौपाई है,
मीराबाई की पदावली
खुसरो की अमर रूबाई है। 

माँ आंगन की तुलसी जैसी
पावन बरगद की छाया है,
माँ वेद ऋचाओं की गरिमा
माँ महाकाव्‍य की काया है। 

माँ मानसरोवर ममता का
माँ गोमुख की उंचाई है,
माँ परिवारों का संगम है
माँ रिश्‍तों की गहराई है। 

माँ हरी दूब है धरती की
माँ केसर वाली क्‍यारी है,
माँ की उपमा, केवल मां है
माँ हर घर की फुलवारी है। 

सातों सुर नर्तन करते जब
कोई माँ लोरी गाती है,
माँ जिस रोटी को छू लेती है
वो प्रसाद बन जाती है। 

माँ हंसती है तो धरती का
ज़र्रा-ज़र्रा मुस्‍काता है,
देखो तो दूर क्षितिज अंबर
धरती को शीश झुकाता है। 

माना मेरे घर की दीवारों में
चन्‍दा सी मूरत है,
पर मेरे मन के मंदिर में
बस केवल माँ की मूरत है। 

माँ सरस्‍वती लक्ष्‍मी दुर्गा
अनुसूया मरियम सीता है,
माँ पावनता में रामचरित
मानस है भगवत गीता है। 

माँ तेरी हर बात मुझे
वरदान से बढकर लगती है,
हे माँ तेरी सूरत मुझको
भगवान से बढकर लगती है। 

सारे तीरथ के पुण्‍य जहां
मैं उन चरणों में लेटा हूं,
जिनके कोई सन्‍तान नहीं
मैं उन माँओं का बेटा हूं। 

हर घर में माँ की पूजा हो
ऐसा संकल्‍प उठाता हूं,
मैं दुनियां की हर माँ के
चरणों में ये शीश झुकाता हूं |

जीवन

मौत से पहले,मरना मत,
परिणाम से पहले, डरना मत !

रगों में तेरे, खून है,
आलस से, पानी,करना मत !!

उम्मीद, जीत की रखना तू,
स्वाद कर्म का, चखना तू!

तू सोना है, कुछ कम तो नहीं,
एकबार, कसौटी पर रखना तू !!

तुझमे सारे है, भेद छुपे,
तेरा कोई भी, पार नहीं !

दिल में, तूने जो ठान लिया,
कभी जाता वो बेकार नहीं !!

सब दौलत, तेरे दिल में है,
फिर भी तू, मुश्किल में है !

तू ढूंढ़, खज़ाना अंदर का,
फिर राजा, तू हर महफ़िल में है !!

तू जोश जगा और डर को भगा,
सारी बाधाये, छुप जायेंगी !

है कीमत, तेरी हिम्मत की,
राहें फिर, शीश झुकायेगी !!

पत्ता भी, दामन छोड़े ना,
चाहे कितने, तूफ़ान चले !

सूख गये, जो ड़ाल पर,
वो खा, पी कर भी नहीं पले !!

भाग्यशाली हो, तुम कितने,
तनिक इसका तुम, विश्वास करो !

सभी बातें, तुम में भी है,
कभी खुद में, तुम तलाश करो !!

है ज्ञान का, भण्डार तू,
और मेहनत का, पहाड़ तू !

बकरी नहीं, तू शेर है,
कभी खुल के, तो दहाड़ तू !!

कहते है, जबतक सांस है,
तबतक, पूरी आस है !

फिर निकल पड़ो, उस राह पर,
जिस मंज़िल की, तुम्हे तलाश है !!

कुछ कर्म नहीं कर सकते वो,
कहते है ये बकवास है !

जो कामचोर से बैठे है,
बस वो तो जिन्दा लाश है !!

मिला खज़ाना, बहुत तुम्हे,
तुम बाँध पोटली, चले गये !

धर्म, कर्म कुछ, किया नहीं,
फिर कहते हो, कि छले गये !!

ना कभी कोई, उपकार किया,
ना खुद का भी, उद्दार किया !

ना समझे मूल्य, इस काया का,
इस जीवन को, बेकार किया !!

हर सांस में, जीवन होता है,
फिर कैसे तू रोता है !

लिख ले अपनी, तक़दीर अभी,
तू वक़्त से पहले, क्यूँ सोता है !!

बनना हो, तो मिशाल बनो,
ना अनसुलझे, सवाल बनो !

अच्छे कर्मो के, साथ चलो,
आदमी फिर, कमाल बनो !!

सैनिक

जब तुलसी पर नागफनी की, पहरेदारी भाती है
तब धरती भी गद्दारो के, रक्त की प्यासी हो जाती है।

जब कुरुक्षेत्र में अर्जुन भी , कायरता दिखलाता है
गदा युद्ध के नियम में , जब भीम भी चोटे खाता है।

जब समाज में वस्त्र हरण को, पुरुषोत्सव समझा जाता है
जब भी राजा, पुत्रमोह में, धृतराष्ट् बन जाता है।

कोई भीष्म और द्रोण भी , सत्ता से बन्ध जाते हो
कर्ण जैसे महावीर भी जब , जब सत्ता को समझ न पाते हो।

और विदुर का निति ज्ञान जब , अंतिम साँसे गिनता हो
तब पुनः भूत में जा गीता का,  पाठ पढ़ाना पड़ता है।

पाञ्चजन्य के शंखनाद से , अलख जगाना पड़ता है
देश धर्म की रक्षा के हेतू से,  शस्त्र उठाना पड़ता है।

कृष्ण खड़े हो दूर तो भी, अभिमन्यु बन जाना पड़ता है
चक्रव्यूह को भेदने को , पौरुष दिखलाना पड़ता है।

संकट की घड़ियों में बस,

सैनिक बन जाना पड़ता है।
सैनिक बन जाना पड़ता है
सैनिक बन जाना पड़ता है |